रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग 

शहडोल। ये खैरहा ग्राम पंचायत है जनाब, यहां दिग्गजो का तांता लगा हुआ है, किसी एक जनाब ने कहा कि मेरे से 1 लाख रुपये लीजिए, मेरे कैंडिडेट की भर्ती होनी चाहिए, उधर योग्य और वरीयता के आधार पर चिन्हित आवेदक विवश होकर कहता है, मेरे पास सिर्फ 30 हजार ही है, कृपया मेरे कैंडिडेट की भर्ती कर दीजिए, लेकिन मामला जेब गर्म करने का है, रोज ऐसे मौके थोड़ी न मिलते है, इसलिए जो सामने है, उसे कैश करना है, क्यो कि चुनाव में हमने भी तो लाखों खर्च किये है, हमे लोगो ने मुफ्त में नही चुना है, जीतने की बकायदा कीमत चुकाई है, इसलिए हर मामले के निपटारे के लिए चढ़ोत्तरी अनिवार्य हो गई, अब अस्तित्व की लड़ाई भी सामने है, भला इससे निपटने की क्षमता किसमे है, ऐसे मामले सिर्फ समझौते में ही अक्सर समाप्त होते देखा होगा। 

सोहागपुर जनपद के खैरहा ग्राम पंचायत में इन दिनों शेर बनने की होड़ लगी हुई है। पंचायत पर आरोप है कि आशा कार्यकर्ता की भर्ती में पद के लिए बोली लगाई जा रही है, यह बोली सिर्फ इसलिए लगाई जा रही है कि जो वर्तमान में पीठाधीश्वर है, उन्होंने ने पद पाने के लिए लाखों रुपये खर्च किये है, और जाहिर सी बात है, वसूली भी कार्यकाल के दौरान ही होनी है, इसलिए भी जो आये मोटी सेवा करे तभी कुछ चिन्हित नाविक किसी के नाव को पार लगा पाएंगे, और यदि नाविक को कीमत नही मिली तो वह बीच मजधार में ही नाव को डुबाने की क्षमता रखता है। 

इस भर्ती में न सिर्फ सरपंच, बल्कि उपसरपंच और इससे ऊपर के भी जनप्रतिनिधि शामिल है, खिलाड़ी तो एक पंच नही बल्कि उसका पति है, कीमत लगी तो पद बिकेगा, नही तो व्यवस्था सरकार की ठप होगी। इसकी चिंता किसे है..? कलेक्टर, एसपी, एसडीएम सभी इस बात की चिंता करते है कि सरकार योजना और उनका मंसूबा जमीन पर उतरे और योजनाओ का क्रियान्वयन हो, लेकिन जमीनी और मैदानी जिम्मेदार सरकार और अधिकारियों के मंसूबे की कीमत लगा रहे है। 

यह एक मिथ्या नही है बल्कि जांच का विषय है, खैरहा ग्राम पंचायत में आशा कार्यकर्ता भर्ती की नब्ज टटोली जाए तो भर्ती को लेकर कैंसर से भी ज्यादा गभीर बीमारी मिलेगी, लेकिन जांच डॉक्टर नही बल्कि प्रशासनिक अधिकारी करे तभी हकीकत और मर्ज सामने आ सकेगा। और इस मामले से यदि आंख मूंदना मुनासिब लगे तो जिम्मेदार गंधारी के समान आंख में पट्टी लगाकर खुद को अज्ञान साबित भी कर सकते है।